फौजी चाचा ने गांड़ मारी

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गर्मियों की छुट्टियों में सौरभ चाचा के अकेले मकान पहुँचा। चाचा अड़तालीस साल के रिटायर फौजी हैं, गोरे, जिम से बना शरीर, और उनका पूरा घर फौजी रूटीन पर चलता है। सुबह चार बजे उठना, कसरत, फिर सादा खाना। रात को दोनों एक ही कमरे में सोया करते थे।

सौरभ बाईस साल का नया जवान लड़का है जो gay सेक्स में काफी इंटरेस्ट रखता है। कॉलेज की छुट्टी में वह अपने फौजी चाचा के घर आया हुआ था। उसे काफी समय से चाचा के प्रति एक अजीब सा आकर्षण था, जो वह पूरी तरह समझ नहीं पाता था।

सौरभ को चाचा का फौजी बदन बहुत पसंद था। रात को सोते समय चाचा बस अंडरवियर में सोते थे। एक रात चाचा का फौजी लंड आधी रात को अंडरवियर के छेद से निकलकर सलामी दे रहा था। सौरभ ने देख लिया और छू भी लिया। उसके बाद हर रात वह धीरे से छू लेता था।

एक रात घर की बिजली चली गई और एसी बंद हो गया। चाचा ने तंग अंडरवियर भी उतार दिया और देसी लुंगी पहनकर सोने चले गए। कमरे में सिर्फ इन्वर्टर से पंखा चल रहा था। गर्मी और उमस ने माहौल और कामुक बना दिया था।

पंखा गरम हवा हिला रहा था, उमस से पसीना चिपक रहा था। सौरभ करवट बदलता रहा, नींद नहीं आई। चाचा की लुंगी ऊपर सरक गई थी। उसने फोन की रोशनी जलाकर देखा—बाल रहित, काला, मोटा लंड सोते हुए भी खड़ा था, जैसे काला भुजंग नाग कुंडली मारे पड़ा हो। सौरभ की साँस रुक गई।

आज उसने बड़ा कदम उठाया। धीरे से हाथ बढ़ाया और उंगलियाँ उस गर्म लंड पर रख दीं। चाचा का लंड उसकी हथेली में सख्त होने लगा, नसें फड़कने लगीं। तभी चाचा की आँखें खुलीं। वे चौंककर उठ बैठे। “सौरभ! ये क्या कर रहा है?”

सौरभ ने हाथ नहीं हटाया। गाल लाल हो गए, पर पकड़ और कस गई। चाचा की साँसें भारी होने लगीं। गुस्से और हैरानी में कड़क आवाज़ में बोले, “तू जानता नहीं इसका नतीजा क्या होगा!” चाचा ने सौरभ की कलाई पकड़ी, पर उंगलियाँ लंड पर ही जमी रहीं।

“हटा हाथ,” आवाज़ में फौजी कड़क थी, पर साँसें धोखा दे रही थीं। सौरभ ने धीरे से कहा, “नहीं हटाऊँगा, चाचा जी।” चाचा ने एक गहरी साँस ली, फिर झटके से सौरभ को अपनी ओर खींच लिया। मोटी उंगलियाँ टी-शर्ट उतारने लगीं, फिर पायजामा भी खिंचकर नीचे गिर गया।

सौरभ की दूध-सी गोरी देह पंखे की हवा में काँपी। चाचा ने उसे पलटकर पेट के बल लिटा दिया और गोरी गांड के दोनों चूतड़ फैलाए। बीच में सील पैक छेद, बंद और गुलाबी, पसीने से हल्का चमक रहा था। चाचा ने मोटी जीभ वहीं रख दी और चाटने लगे।

सौरभ की सिसकी निकली, उंगलियाँ चादर मरोड़ने लगीं। जीभ छेद को लार से भिगोती गई। फिर चाचा ने उसे घुटनों पर बिठाया और काला लंड होठों के सामने किया। गुलाबी सुपारा निचले होंठ पर रगड़ा। “चूस,” कमांड गूँजा। सौरभ ने होंठ खोले और सुपारा अंदर ले लिया। नमकीन गर्मी जीभ पर फैल गई, लार ठोड़ी तक बहने लगी।

चाचा की उंगलियाँ बालों में धँस गईं। फिर लार से भीगी दो उंगलियाँ छेद पर रखीं और धीरे-धीरे अंदर घुसा दीं। सौरभ की चीख दबी रह गई क्योंकि मुँह काला भुजंग नाग से भरा था। उंगलियाँ हिलकर छेद खोलने लगीं। फिर लंड बाहर खींचा और ठोड़ी पकड़कर कहा, “अब तैयार हो जा, मेरा पूरा देसी लंड तेरी गांड में जाएगा।”

चाचा ने तीन इंच मोटी काली शैफ्ट सील पैक छेद पर टिकाई और धक्का दिया। सुपारा घुसते ही सौरभ चीखा, मांसपेशियाँ अकड़ गईं। कमर पकड़कर और जोर से धकेला, सील टूटी, लाली और चिकनाई मिलकर छेद से बह निकली। काला भुजंग नाग धीरे-धीरे अंदर उतरता गया। पंखे की आवाज़ के ऊपर सिसकियाँ उठीं।

चाचा ने कुत्ता स्टाइल में झुकाकर पूरी गहराई तक ठोकना शुरू किया। हर धक्के पर मांसपेशियाँ फैलतीं, अंडकोश गांड से टकराते। चूत-चूत की आवाज़ कमरे में गूँजने लगी। सौरभ की उंगलियाँ चादर मरोड़ रही थीं, मुँह खुला था, लार टपक रही थी।

फिर चाचा ने सौरभ को अपने ऊपर बैठा लिया। सौरभ काले लंड पर उछलने लगा, गांड की गहराई तक लेता, पिंक निपल्स छूता। पसीने से दोनों की देह चिपचिपी हो गई।

सुबह होते ही चाचा ने मिशनरी में लिटाकर फिर चोदना शुरू किया। तेज़ रफ्तार से लंड जाता-आता रहा। सौरभ का लंड पेट पर रगड़ खाकर वीर्य छोड़ बैठा। गांड की मांसपेशियाँ लंड को जकड़ने लगीं। चाचा ने झटके से बाहर खींचा और गाढ़ा वीर्य छेद और पीठ पर छोड़ दिया। वीर्य बहता हुआ चादर पर गिरता रहा।

पीठ पर गाढ़ा वीर्य अभी चिपचिपा था, छेद से रिसता हुआ लाली-मिला पानी चादर पर फैल चुका था। साँसें धीरे-धीरे एक होने लगीं। पंखे की गरम हवा पसीने से भीगी देहों पर ठंडक जैसी लगती। चाचा ने करवट लेकर गाल उंगलियों से छुआ—धीरे, जैसे कोई आदेश नहीं, एक शांत स्वीकृति हो।

उन्होंने सौरभ को बाहों में खींच लिया। सिर चौड़ी छाती पर टिक गया, पिंक निपल्स के पास। नज़र नीचे गई—बाल रहित लंड अब ढीला पड़ा था, वीर्य से सना, पर डर नहीं था, सिर्फ भरा संतोष। सौरभ ने कमर पर हाथ रखा। चाचा ने बालों में उंगलियाँ फेरीं। कोई शब्द नहीं। पंखा गूँजता रहा।

सौरभ ने करवट बदलने की कोशिश की। उसी पल छेद में भेदक दर्द उठा, साँस रुक गई। मांसपेशियाँ जकड़ गईं, सूजा छेद सिकुड़ गया। वह छटपकाकर छाती से अलग होकर बैठ गया। दबी चीख निकली, आँखों में पानी भर आया।

“चाचा.. गांड में बहुत दर्द हो रहा है,” काँपती आवाज़ में कहा, हाथ पीछे ले जाकर गोलों को हल्के छूते हुए। छूते ही जलन हुई। चाचा ने तुरंत कंधे पकड़े। “लेट जा, पेट के बल। दिखा मुझे।”

“नहीं चाचा, छूना मत…” विरोध किया, पर चेतावनी नज़रअंदाज़ हुई। धीरे पेट के बल लिटाया, कूल्हे थोड़े ऊपर उठाए, दोनों गोल फैलाए। सौरभ कराह उठा। “शाबाश, सब्र कर,” धीमे स्वर में कहा। छेद के किनारे फटे हुए थे, हल्की लाली-मिला पानी अभी रिस रहा था।

अलमारी से नारियल तेल की शीशी उठाई, हथेली पर ठंडा तेल डाला। “यह जलन कम करेगा।” तेल दरार में डाला। ठंडा तेल किनारों से रिसता अंदर बहा, सौरभ ने राहत की लंबी साँस छोड़ी। उंगली पर और तेल लगाकर सूजे छेद पर गोल-गोल मालिश करने लगे।

“आह.. ठंडा है..” दर्द और राहत मिली आवाज़ निकली। उंगली तेल के साथ सिकुड़े छेद पर दबी, फिर धीरे अंदर फिसल गई। शरीर एक पल तन गया, पर उंगली बाहर नहीं खींची। अंदरूनी दीवारों पर तेल रगड़ती रही। दर्द की जगह ठंडक और सुकून ने ले ली। मांसपेशियाँ ढीली पड़ीं, लंड चादर पर रगड़ खाकर अधखड़ा हो गया।

“अच्छा लग रहा है?” उंगली आराम से अंदर-बाहर हो रही थी। “हाँ चाचा.. बहुत आराम मिल रहा है।” पिछली रात का सूखा वीर्य और लाली-मिला पानी तेल के साथ बाहर निकलकर चादर पर फैल गया। उंगली और गहराई तक सरकाई। साँसें शांत हो गईं, शरीर ढीला पड़ गया।

चाचा ने करवट पर घुमाया और छाती से लगा लिया। सिर चौड़ी छाती पर टिका, उंगली तेल लगी गांड में धीरे आराम से अंदर-बाहर होती रही। फिर उंगली बाहर खींची और बालों में हाथ फेरा। “चल, नहा लेते हैं। पसीना और तेल सब चिपक गया है।” सौरभ धीरे उठा, हल्की जलन बाकी थी, पर मालिश ने राहत दी थी।

दोनों बाथरूम की ओर बढ़े। शॉवर चालू हुआ, गर्म पानी दोनों पर गिरने लगा। सौरभ ने चौड़ी पीठ पर हाथ फेरा। चाचा पीछे मुड़कर गर्दन चूमे, होंठ गीली त्वचा पर सरक गए। सौरभ का लंड धीरे खड़ा होने लगा।

उसने कमर पकड़ी और चाचा को दीवार की ओर घुमा दिया। गांड के बीच काला मुंडा गुदा छेद पानी की फुहार में साफ दिख रहा था। सौरभ ने अधखड़ा लंड उस सिकुड़े छेद पर रगड़ा। “सौरभ. क्या कर रहा है?” गहरी आवाज़ में झिझक थी, मना नहीं। “चाचा. आज मैं करूँगा,” उत्तेजित आवाज़ में कहा।

कंधे पकड़कर आगे झुकाया, हथेलियाँ गीली टाइल्स पर टिक गईं। लंड नरम किनारे पर रगड़ा, पानी और त्वचा की गर्मी चढ़ रही थी। कमर आगे धकेली और लंड धक्के से अंदर घुसा दिया। “आह!” दर्द और सुख की सिसकारी निकली। दीवारें लंड को कसकर जकड़े थीं। अंदर की गर्मी ने पागल कर दिया।

कमर पीछे खींची फिर आगे ठेली। गोरा लंड गर्म सख्त दीवारों पर रगड़ता अंदर-बाहर होने लगा। “चाचा. आपकी गांड बहुत टाइट है।” साँसें तेज़ हो चुकी थीं। कमर पकड़कर ज़ोर के झटके शुरू किए। काला मोटा लंड टाइल्स पर ठुकरा रहा था। सिसकारियाँ बार-बार निकलीं, उंगलियाँ टाइल्स पर भिंच गईं।

रफ्तार बढ़ी, लंड पूरा अंदर तक ठेलता बाहर आता फिर धंसता। पानी की बौछार गिर रही थी, चपचप आवाज़ बाथरूम में गूँज रही थी। लंड अंदर फैलने लगा, जाँघें काँपने लगीं। “चाचा. मैं. अंदर ही.” कराहते कहा। चाचा ने कमर पीछे धकेल दी।

आखिरी झटका मारा और गाढ़ा वीर्य गांड के अंदर गूँथ दिया। शरीर काँप उठा, धारें गहराई में भरती चली गईं। छेद वीर्य लेकर सिकुड़ता रहा, फिर ढीला पड़ा। लंड धीरे बाहर खींचा। वीर्य-मिला पानी जांघों से रिसकर नाली में बहने लगा।

चाचा धीरे सीधे हुए और सौरभ को बाँहों में भर लिया। गर्म पानी वीर्य और पसीना नाली में बहा रहा था। लंड ढीला पड़ चुका था। दोनों पानी के नीचे लिपटे रहे।

 

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